रविवार, 29 नवंबर 2009

रातें हमने आँखों में गुजारी है

दिल की दुनिया टूटने के बाद सब रोते थे,
हम थे की पागलों की तरह हँसते थे,
यह हल-ऐ-दिल हम कैसे सुनाते सबको कि,
तकलीफ न हो उनको इस लिए अकेले रोते थे।

बनाके अपना हमको भुलाने वाले हो तुम,
दिखाके रौशनी हमको जलाने वाले हो तुम,
अभी तक हम पुराने जख्मो से उभरे नही,
आज फिर से कोई नया दर्द उठाने वाले हो तुम,
इतनी रातें हमने आँखों में गुजारी है,
क्या आज रात मेरे खवाबो में आने वाले हो तुम।

हर दर्द हर ज़ख्म की वजह दिल है
प्यार आसान है मगर निभाना मुस्किल है।
डगर टेडी-मंदी भूलभुलैया मंजिल है
लहर बचा देती है डूबा देता साहिल है
तूफान से बना इसमे दरिया गया मिल है।

Ravi Srivastava

अनजान सफर

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर पे हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर, उधर के हम हैं,
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दुसरे घर के हम हैं।


वक्त के साथ है मिटटी का सफर सदियों तक,
किसको मालूम कहाँ के हम किधर के हैं,
चलते रहते हैं की चलना है मुसाफिर का नसीब,
सोचते रहते हैं किस राहेगुज़र के हम हैं...

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

शहीद हूँ मैं ...


दोस्तों , मेरी ये नज़्म , उन सारे शहीदों को मेरी श्रद्दांजलि है , जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर , मुंबई को आतंक से मुक्त कराया. मैं उन सब को शत- शत बार नमन करता हूँ. उनकी कुर्बानी हमारे लिए है .

शहीद हूँ मैं .....

मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...

जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..


जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.

जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी

जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
वो अब भी मेरे लिए जागते है ...

मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………

Vijay Kumar Sappatti

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

अल्फाजों मे वो दम कहा


अल्फ़ाज़ों मैं वो दम कहाँ जो बया करे शख़्सियत हमारी,
रूबरू होना है तो आगोश मैं आना होगा ,
यूँ देखने भर से नशा नहीं होता जान लो साकी,
हम इक ज़ाम हैं हमें होंठो से लगाना होगा.


हमारी आह से पानी मे भी अंगारे दहक जाते हैं,
हमसे मिलकर मुर्दों के भी दिल धड़क जाते हैं,
गुस्ताख़ी मत करना हमसे दिल लगाने की साकी,
हमारी नज़रों से टकराकर मय के प्याले चटक जाते

जब हमसे कोई जुदा होता है तो जैसे मछलियाँ पानी से जुदा हो जाती है
हमारी याद मे ये हवा भी जल जाती है
हमें मिटाने की बेकार कोशिश ना करो तुम ,
क्यों की जब हम दफ़न होते हैतो ये जमी भी पिघल जाती है!!
ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

लम्हों ने खता की है....सदियों ने सजा पाई.....!!

लम्हों ने खता की है....सदियों ने सजा पायी.....!!
हवा की तरह एक-एक कर दिन बीतें जा रहे
हैंपता नहीं किस उम्मीद में हम जिए जा रहे हैं !!
किसी को मयस्सर नहीं है दो जून की रोटियाँ
शायद इसी गम में "कुछ लोग"पीये जा रहे हैं !!
कल सूरज नहीं निकलने वाला हो शायद इसीलिए
इस रात को ये अमीर लोग चरागाँ किए जा रहे हैं !!
मुश्किलें हैं ही कहाँ,मुश्किलें तो इक भ्रम है भाई
गरीब लोग तो बेकार ही मुश्किलों से मरे जा रहे हैं !!
भलाई की कोई उम्मीद नज़र तो नहीं आती फिर भी
हम(ब्राह्मण)ये साल अच्छा है-अच्छा है,किए जा रहे हैं!!
{इक ब्राहमण ने कहा है की ये साल अच्छा है,"ग़ालिब"}
कुछ लोगों को शायद यूँ ही मर जाना लिखा होता हो ओ
इसीलिए हम भी "गाफिल"जिए जा रहे हैं,जिए जा रहे हैं !!
सच बताऊँ तो यह ग़ज़ल समझ कर नहीं लिखी है,सच बताऊँ तो अपने समय में अपने ख़ुद के होने का कोई औचिया नहीं दिखाई देता,अपने होते हुए अपने चारो तरफ़ इतना कुछ होता हुआ दिखायी देता है,वो इतना दर्दनाक है,इतना मर्मान्तक है,कि दम-सा घुटता है,जुबां को रोका जा सकना कठिन होता है और आंखों से आंसूओं को रोक पानाभी,मगर सिवाय टुकुर-टुकुर ताकने के हम (बल्कि)मैं कुछ नहीं कर पाते।तो ऐसा भी जीना भला कोई जीना हुआ ??मगर जिए जाता हूँ.....अपने होने का अहम् और साथ ही अपने ही ना होने जैसी विवशता की पीड़ा...ये दोनों बातें एक साथ होती हैं तो कैसा होता है....??अपने को बहुत-कुछ समझने का बहम और कुछ भी नहीं होने का अहसास.....अपनी बातों में ख़ुद को दिखायी देती समझदारी और अपनी बातों को किसी को समझा नहीं पाने की मजबूरी......!!आदमी शायद ख़ुद को खुदा समझता है,शायद इसीलिए हर आदमी रोज सुबह अपनी-अपनी मस्जिद को जाता है....और शाम को गोया पिट-पिटा कर लौट आता है....आदमी की किस्मत ही ऐसी है,या आदमी ख़ुद अपनी किस्मत ऐसी ही बनाये हुए है....??......हमने खूब सारे ऐसे अकेले आदमी को देखा है,जिसने अपने बूते दुनिया बदल दी है.....मगर कोई सोच भी नहीं पता कि दरअसल वो ख़ुद भी इस छोटी-सी कतार में ख़ुद को खड़ा कर सकने का माद्दा अपने भीतर संजोये हुए है....!!हर आदमी दरअसल एक हनुमान है,जिसे अपनी भीतरी वास्तविक शक्तियों का अनुमान नहीं है,मगर याद दिलाये जाने पर शायद उसे भान हो जाए...उन व्यक्तियों में से एक तो मैं ख़ुद भी हो सकता हूँ....!!इस तरह विवश होकर जीना भी क्या जीना है....??कुछ भी ना कर सकना भी क्या होने में होना है....??.....एक-एक पल... मिनट...घंटा....हफ्ता.....साल.....दशक.....शताब्दी .....युग......बीता जा रहा है.....आदमी के भौतिक विकास की गाथा तो दिखायी देती है.....उसकी चेतना और आत्मा में क्या विकास हुआ है....किस किस्म का विकास है....आदमी अपने भीतर कहाँ तक पहुँचा है.....यह देखता हूँ तो कोफ्त होती है....क्योंकि....भौतिक चीज़ों की अभिलाषा में आपाद-मस्तक डूबा यह आदमी लालच के एक ऐसे सागर में डूबा हुआ दिखायी देता है....जिसकी गहराई की कोई थाह ही नहीं दिखायी देती.....और इस लालच के मारे असंख्य अपराध और असंख्य किस्म के खून-कत्ल आदि किए जा रहा है...किए ही जा रहा है.....और शायद करता भी रहेगा.....ऐसे आदमी को इस भूत का सलाम.....ऐसी मानवता को इस भूत का हार्दिक सैल्यूट......और आप सबको असीम प्रेम......भरे ह्रदय से आप सबका

भूतनाथ.......!!

क्या आत्म-हत्या करना एक आखरी रास्ता हैं?


कई लोग सोच रहे होंगे की क्या आत्म-हत्या करनेकी बात ये लड़का क्यों कर रहा हैं, लकिन कई बार हमारे जीवन में कई ऐसी परिस्थितिया और माहौल ऐसे आ जाते हैं जो बिल्कुल प्रतिकूल होते हैं. अभी कुछ दिन पहले ही मेरे साथ भी यही हुआ.
रात में सोच रहा था की काश की मैं इस दुनिया में आया ही नहीं होता|
लेकिन अगले दिन सुबह सब कुछ पहले जैसा ही हो गया और फिर मुझे रात वाली बात याद आई और मुझे काफी ज्यादा दुःख इस बात का हुआ की मैंने पिछली रात अपने मूल्यवान जीवन को नष्ट करने के बारे में सोचा . ये जीवन तो उस भगवन की देन हैं और मैं कौन होता हूँ इसे नष्ट करने वाला और तो और मैंने ये तक नहीं सोचा की अगर मैं इसे ख़त्म कर देता तो उन लोगो का क्या होता जो मेरे इतने करीब हैं की मेरी हर सांस के साथ उनकी भी साँसे जुडी हुई हैं.
हम लोगो को जब तक सुख मिलता हैं तब तक हम कभी किसी को भी नहीं कोसते या कभी भगवन को भी शुक्रिया अदा नहीं करते. लेकिन जैसे ही वो सुख चला जाता हैं तो हमारा स्वाभाव कुछ ऐसा क्यों हो जाता हैं की सिर्फ हम शिकायते ही करते रहते हैं और उस भगवन को कोसते हैं की हमारी ऐसी परीक्षा क्यों ले रहा हैं? क्या ये सही हैं ?

मुझे इस बात का अफ़सोस हैं की मैंने अपनी उस माँ के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचा जिसने मुझे पैदा किया ? और पुरे नौ महीने अपनी कोख में पाला और वो दर्द सहा...........
माँ-बाप का दर्जा तो भगवन से भी उचा होता हैं लेकिन मैंने अपने उसी भगवन को ही अपमानित किया. मैं बेवकूफ सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही ऐसा करने की सोच रहा था.

लेकिन जब मेरा इरादा अगले दिन बदला तो मुझे इसका अहसास हुआ की मैं कितना गलत था!!!!!
मेरी उस बेतुकी सी सोच का क्या अंजाम होता. लोग तो यही कहते न की बेवकूफ था वो जिसने आत्महत्या कर ली और अपने माँ-बाप, दोस्तों, भाई - बहनों को रोता बिलखता छोड़ गया अपने पीछे, ऐसी औलाद होने से अच्छा तो ये होता की हमरी औलाद ही ना हो.
क्यों ये सच हैं न !! जो व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर उन समस्याओ को सुलझा न पाए तो उस व्यक्ति को आप क्या कहेंगे ???
मुझे पता हैं आपका उत्तर क्या होगा ?

आप उस व्यक्ति को कायर कहेंगे जिसने सिर्फ अपने हिस्से का सुख तो भोग लिया लेकिन अपने हिस्से का दुःख भोगने के लिए अपने प्रियजनों को अपने पीछे छोड़ गया.

लेकिन उन परिस्थितियों में मेरी जगह कोई भी व्यक्ति होता तो वो भी ऐसा ही सोचता की .........
लेकिन क्या करे इंसान की फितरत ही कुछ ऐसी होती हैं की वो वो सब करने की सोचता हैं जो उसे नहीं करना चाहिए.

इस घटना से मैंने तो एक बहुत ही अच्छी सीख ली की...
चाहे जैसी भी परिस्थितिया क्यों न आ जाये मेरे सामने, उसका डट कर सामना करना हैं. क्योंकि अगर मैंने दुबारा आत्महत्या करने का सोचा तो मेरे बाद कई और हत्याए होंगी, किसी माँ की उन सभी इच्छाओ का, किसी पिता की उन उमीदो का, किसी बहन की उन आशाओ का, जो उन्होंने अपने उस बेटे से लगा रखी थी जो उन्हें बेसहारा छोड़ गया.
Pawan Kumar Mall

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

माँ..मुझे मार दो


प्यारी माँ,
तुम्हे देखा तो नहीं है, न ही तुम्हारी आवाज़ सुनी है, पर तुम्हारी धङकनों से सब समझती हूँ। माँ...आज तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ। मैं बहुत डरी हुई हूँ। माँ कल ही जब तुम्हारी धङकनो की रफ्तार बङी तो मुझे पता चला कि पङोस वाली गीता दीदी के साथ क्या हुआ। दीदी के चेहरे पर किसी ने तेजाब डाल दिया है न माँ...वो जल गई है न...मैंने महसूस किया था दीदी की माँ रो-रो कर कह रही थी “मेरी बेटी का क्या कसूर था...सिर्फ छेङखानी का विरोध ही तो किया था न उसने...उसकी इतनी बङी सजा़? क्या होगा अब मेरी बेटी का...???”...माँ, दीदी का क्या दोष था..?
माँ परसो मुझे चोट लग गई...जानती हूँ आपको भी काफी चोटे लगी है...पापा ने आपको क्यूँ मारा माँ? मुझे बहुत दर्द होता है...ऐसी चोटे मुझे अक्स़र लगती रहती है..माँ पापा से कहिये न कि उनकी हिंसा उनकी बेटी तक पहुँच रही है..मां..करुणा बुआ की आहट अब कब सुनाई देगी? हा माँ..आपकी धङकनों ने सब बता दिया।करुणा बुआ का स्कूल छुङवा कर उनकी शादी करवा दी न माँ..पर अभी तो वो छोटी है न माँ..अब वो खेलने कैसे जाएंगी माँ..?मैंने तो सोचा था उन्हीं से पढ़ना लिखना सीखूंगी।दादू ने बुआ की शादी इतनी जल्दी क्यूँ कर दी माँ..?
माँ उस दिन चाचा के गुस्से को आपकी धङकन से महसूस किया था।चाची अपने घर से क्या नहीं लायी जो चाचा उनको लाने को कह रहे थे माँ...चाचा चाची को वापस भेजने को भी तो कह रहे थे न..पर माँ,चाची तो अभी अभी ही आई है..मैं तो सोच रही थी चाची ही मुझे तैयार किया करेंगी।चाचा से कहो न माँ...कितना सामान तो लाई थी चाची..अब वो उन्हें घर न भेजे...
माँ आपको मेरी नन्ही आँखों को खुलते देखने का..मेरे छोटे गुलाबी हाथों को अपने हाथों में लेने का.. रोने की आवाज़ सुनने का बहुत इंतज़ार है न..मैं जानती हूँ आपको जानकर बहुत दुख होगा,पर माँ..मैं बहुत डर गई हूँ।माँ सारी बेटियों की ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ होती है?आपकी दुनिया में आने के बाद मेरी हालत भी गीता दीदी,करूणा बुआ,चाची और आपकी तरह हो जाएगी न?माँ मुझपर रहम करो,मैं इस बेरहम दुनिया में नहीं जी पाऊंगी..इसलिए मेरी ये विनती सुन लो...माँ मुझे जन्म न दो...मार डालो...इससे पहले की मैं बारबार मरुँ...
आपकी अजन्मी बेटी


शबनम खान

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